आत्मतत्व का ज्ञान ही मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य है ।इस लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रभु के चरणों में समर्पण आवश्यक है श्री हनुमान जी के हृदय में भगवान का निवास होने से वे बल एवं बुद्धि के धाम है आंखें बंद करने का अर्थ है विश्वास करना जबकि आंखें खोलना विचार करने का प्रतीक है - AKN News India

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Friday, 22 March 2024

आत्मतत्व का ज्ञान ही मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य है ।इस लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रभु के चरणों में समर्पण आवश्यक है श्री हनुमान जी के हृदय में भगवान का निवास होने से वे बल एवं बुद्धि के धाम है आंखें बंद करने का अर्थ है विश्वास करना जबकि आंखें खोलना विचार करने का प्रतीक है




आत्मतत्व का ज्ञान ही मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य है ।इस लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रभु के चरणों में समर्पण आवश्यक है 

 श्री हनुमान जी के हृदय में भगवान का निवास होने से वे बल एवं बुद्धि के धाम है  

आंखें बंद करने का अर्थ है विश्वास करना जबकि आंखें खोलना विचार करने का प्रतीक है


 नर्मदा पुरम। पंच दिवसीय पंडित रामलाल शर्मा स्मृति समारोह के चौथे दिन प्रवचन पीठ से अपने व्याख्यान में बांदा चित्रकूट से पधारे विख्यात कथाकार डॉ रामगोपाल तिवारी मानस रत्न ने कहा कि आत्मतत्व का ज्ञान ही मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य है । 
इस लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रभु के चरणों में समर्पण आवश्यक है कथा के क्रम में सुंदरकांड के अशोक वाटिका प्रसंग में वैदेही दर्शन की ओर अग्रसर होते हुए आपने कहा कि श्री हनुमान जी जिस तरह गुफा में नेत्र बंद कर देखते हैं, उन्हें भक्ति स्वरूपा मां सीता का दर्शन होता है जबकि अन्य वानर नेत्र बंद कर जल्दी ही नेत्र खोल देते हैं उन्हें अधीरता के कारण उस समय भक्ति की प्राप्ति नहीं होती है 
समुद्र तट पर जब जामवंत जी अंगद एवं हनुमान जी वार्ता करते हैं तो जामवंत जी भूतकाल के बल का बखान करते हैं जबकि अंगद जी भविष्य की चिंता करते हैं अर्थात वृद्धि जामवंत जी एवं युवा अंगद दोनों ही चिंता करते हैं जबकि हनुमान जी वर्तमान में निश्चिंत रहते हैं वह संपाती की बातों को अपने हृदय में धारण करते हुए अर्थात हृदय में भगवान श्री राम को विराजमान करते हुए लंका में प्रवेश कर जाते हैं श्री हनुमान जी के हृदय में भगवान का निवास होने से वे बल एवं बुद्धि के धाम है ।पूज्य मानस रत्न जी कहते हैं आंखें बंद करने का अर्थ है विश्वास करना जबकि आंखें खोलना विचार करने का प्रतीक है। सती प्रसंग में भगवान शिव नेत्र बंद कर भगवान राम का दर्शन करते हैं जबकि सती जी नेत्र खोलकर भगवान का दर्शन करने से उन्हें संशय हो जाता है।
कार्यक्रम के शुभारंभ में पूज्य पं रामगोपाल तिवारी जी का पुष्पहार से स्वागत नर्मदा शिक्षा समिति के प्रबंधक अरुण शर्मा के साथ श्री रामदास मीना, शिव दीक्षित ,के एन त्रिपाठी , नर्मदा प्रसाद सिसोदिया, खेमचंद यादवेश, महेश पटेल ,प्रमोद दुबे, अशोक पालीवाल, रेवती पालीवाल, ओपी शर्मा ने किया प्रवचन के पूर्व भजनांजली में गायक द्वारा भजनों की प्रस्तुति दी गयी हारमोनियम पर आदित्य परसाई , तबले पर विपुल दुबे ने संगत की संचालन डॉ संजय गार्गव ने किया ।
मनोज सोनी एडिटर इन चीफ 


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