पोषण अनाज महोत्सव 2023 के अंतर्गत
शा गृहविज्ञान स्नातकोत्तर अग्रणी महाविद्यालय के तत्वाधान में प्राचार्य डॉ. श्रीमती कामिनी जैन के निर्देशन में
मिलेट्स के उपयोग एवं महत्व विषय पर व्याख्यान संपन्न
नर्मदा पुरम । पोषण अनाज महोत्सव 2023 के अंतर्गत शासकीय गृहविज्ञान स्नातकोत्तर अग्रणी महाविद्यालय नर्मदापुरम के गृह विज्ञान विभाग के तत्वाधान एवं महाविद्यालय की संरक्षक एवं प्राचार्य डॉ. श्रीमती कामिनी जैन के निर्देशन में मिलेट्स के उपयोग एवं महत्व एवं मिलेट्स की क्षेत्रीय उपस्थिति विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया।
व्याख्यान में मुख्य रूप से कृषि विज्ञान केंद्र हरदा के वैज्ञानिक एस के तिवारी एवं कृषि वैज्ञानिक डॉ. संध्या मूरे मुख्य वक्ता के रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम में गृह विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. किरण पगारे ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि लोगों को मिलेट्स के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए, मोटे अनाज पौष्टिकता से भरपूर होते हैं इनके प्रयोग से विभिन्न बीमारियों से बच सकते हैं। मोटे अनाजों का उत्पादन बढ़े, इनकी उपयोगिता बढ़े, इस दिशा में सरकार प्रयासरत है। यह बहुत बड़ी भ्रांति है कि मोटे अनाज गरीबों का खाना है पर वास्तव में मोटा अनाज पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्धक तो है ही साथ ही स्वाद से भरपूर है। संपूर्ण भारत में यह वर्ष मिलेट्स वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ श्रीमती कामिनी जैन ने मोटे अनाज के महत्व पर प्रकाश डाला उन्होंने कहा कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। शरीर के पोषण के लिए केवल भोजन ही नहीं अपितु पोषक तत्वों की आवश्यकता भी होती है यह पोषक तत्व हमें मोटे अनाज से अत्यधिक मात्रा में मिलते हैं।
इस क्षेत्र में जागृति लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने अलग-अलग स्थानों पर अनेक कार्यक्रम तैयार किए हैं। जीवन शैली में बदलाव आने से विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं ने हमारे शरीर में प्रवेश किया है इसलिए हमें पोषण एवं आहार की आदतों में सुधार करने की आवश्यकता है ।हम मोटे अनाजों का उपयोग करके विभिन्न बीमारियों से बच सकते हैं इन मोटे अनाजों में कैल्शियम, मैग्नीज, प्रोटीन आदि तत्व पाए जाते हैं। रागी कैल्शियम का सबसे बड़ा स्रोत है जो इसमें प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। कोदो कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है। प्राचीन समय में महिलाएं चक्की चलाती थी, सिलबट्टे में काम करती थी और अन्य उपकरणों का प्रयोग करती थी ,जो हाथ से संचालित होते थे जिसके कारण उनकी अपने आप ही एक्सरसाइज हो जाती थी जिससे वे स्वस्थ रहती थी परंतु अब ऐसा संभव नहीं है इसलिए महिलाओं को खासकर अपने आहार और पोषण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक एस के तिवारी ने कहा कि यह हमारी सरकार की पहल और सोच का परिणाम है कि जिन्होंने मोटे अनाज का महत्व संपूर्ण विश्व को बताया। छत्तीसगढ़ अंचल में जो आदिवासी रहते हैं वह इस मोटे अनाज का उपयोग करते हैं और इसी के कारण वे अन्य प्रदेशों की तुलना में अधिक स्वस्थ हैं। उन्होंने बताया कि मोटे अनाज को हमारी सरकार ने श्री अन्न का नाम दिया है, इसके अंतर्गत आठ प्रकार के अनाज ज्वार ,बाजरा, कोदो, कुटकी, रागी ,जीना, कंगनी, सबा आदि आते हैं । यह सभी अनाज घास कुल के पौधे हैं ,इसे किसान नहीं लगाते तो भी यह उचित वातावरण मिलने पर अपने आप उग आते हैं। अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने पूर्व में ही इसके महत्व को समझ लिया था और इसके विभिन्न उत्पाद बाजार में उतारे । मोटे अनाजों का इतिहास हजारों साल पुराना है। 131 देशों में इन मोटे अनाजों का उत्पादन और प्रयोग किया जाता है। अफ्रीकी देशों में यह मुख्य खाद्य पदार्थ के रूप में प्रयोग होता है। भारत में राजस्थान और कर्नाटक दो ऐसे राज्य हैं जहां पर अधिकांश मोटे अनाज का उत्पादन होता है। गेहूं में ग्लूटेन नामक तत्व पाया जाता है जो बहुत सारी बीमारियों की जड़ है परंतु इन मोटे अनाजों में यह तत्व नहीं पाया जाता सभी मोटे अनाजों की उत्पत्ति का स्थान भारत ही है। अफ्रीका में आज जो मोटे अनाज का उत्पादन होता है उसका वह भारत से ही गया है। उन्होंने बताया की कुटकी का लगातार तीन महीने प्रयोग करने से शुगर पेशेंट में इंसुलिन अपने आप बनने लगता है। इसकी पौष्टिकता दलहनी फसलों के बराबर है। भारत सरकार ने जैविक भारत का लोगो लॉन्च किया है । जिस उत्पाद पर जैविक भारत का लोगो लगा होता है वह टोटली केमिकल फ्री उत्पाद होता है, उन्होंने जैविक फसल और प्राकृतिक खेती पर बल दिया, उन्होंने बताया कि एक गाय से 10 एकड़ क्षेत्र में प्राकृतिक खेती की जा सकती है।
डॉ. संध्या मूरे कृषि वैज्ञानिक ने अपने उद्बोधन में कहा कि यह रोजगार का साधन भी बन सकता है इसमें केमिकल बिल्कुल नहीं होता क्योंकि यह अपने आप उत्पादित होने वाली फसल है यह हानि रहित है विश्व का 41ः मोटा अनाज भारत में ही पाया जाता है इससे नए नए व्यंजन नए स्वाद के साथ बनाए जाते हैं इनसे विभिन्न उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं जो भारत में ही नहीं संपूर्ण विश्व में भी बेचे जा सकते हैं उन्होंने इसके व्यवसायीकरण पर जोर दिया तथा छात्राओं से अपील की कि वे इन अनाजों के व्यवसाय की दिशा में आगे बढ़े, स्वरोजगार एक उपयुक्त विकल्प है। मोटे अनाजों में पैरासाइट्स का प्रयोग नहीं किया जाता इसलिए इनका प्रयोग करके हम विभिन्न बीमारियों से बच सकते हैं।
गृह विज्ञान विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ.भारती दुबे ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया। कार्यक्रम में डॉ. वर्षा चौधरी, डॉ संध्या राय, डॉ रश्मि श्रीवास्तव ,डॉ संगीता अहिरवार, डॉ रीना मालवीय, डॉ मनीषा तिवारी, डॉ आभा वाधवा, डॉ किरण विश्वकर्मा, डॉ. संगीता पारे, डॉ. नीलम चौधरी, अंकिता तिवारी कुमारी श्वेता वर्मा ने अपनी गरिमामई उपस्थिति दी। डॉ संध्या राय ने उपस्थित अतिथियों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में बडी संख्या में छात्राएं उपस्थित रही ।
मनोज सोनी की विशेष रिपोर्ट


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