सर्व ब्राह्मण समाज एवं नागेश्वर मंदिर समिति द्वारा श्रावणी उपाकर्म का आयोजन गोलघाट पर होगा
मनोज सोनी
नर्मदापुरम --श्रावण पूर्णिमा विक्रम संवत 2080 तदनुसार 31 अगस्त को प्रातःकाल की शुभ वेला में गत वर्षानुसार सर्व ब्राह्मण समाज एवं नागेश्वर मंदिर समिति द्वारा जगदीश मंदिर (गोलघाट ) पर श्रावणी उपाकर्म कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा आचार्य पंडित नीरजेश त्रिपाठी एवं मंदिर समिति व्यवस्थापक पंडित अशोक दुवे ने संयुक्त रूप से नवभारत संवाददाता को बताया कि इस वर्ष आचार्यो तथा पंचांगों के मतानुसार 30 अगस्त को प्रातः 9 बजकर 51 मिनिट से पूर्णिमा प्रारम्भ होगी तथा 10 बजे से रात्रि 8 बजकर 37 मिनिट तक भद्राकाल होगा शास्त्रों में भद्राकाल में विशेष रूप से रक्षाबंधन को निषेध किया गया है। आचार्य त्रिपाठी ने बताया कि पूर्णिमा तिथि 31 अगस्त प्रातः 7 बजकर 35 मिनिट तक है और शास्त्रों की मान्यतानुसार उदयातिथि में ही स्नान दान व्रत इत्यादि कर्म शुभ होते है। इस कारण 31 अगस्त गुरुवार को प्रातःशतभिषा नक्षत्र में श्रावणी उपाकर्म किया जाना श्रेष्ठ होगा ।इस अवसर पर ब्राह्मणों द्वारा दशविध स्नान ,देव तर्पण ,ऋषि तर्पण ,पितृ तर्पण ,सप्त ऋषि गौरी गणेश इत्यादि पूजन यज्ञोपवीत पूजन एवं धारण कर हवन होम कर्म किया जावेगा ।आचार्यों ने जानकारी देते हुए बताया कि इस अवसर पर ब्राह्मण बटुकों का उपनयन संस्कार कराया जावेगा। वहीं प्रतिवर्षानुसार आयोजित संस्कृत पखवाड़े का समापन भी किया जाएगा। समस्त ब्राह्मणों को श्रावणी उपाकर्म ओर गायत्री अनिवार्य रुप से करना चाहिए, यज्ञोपवीत धारण कर हमारी संस्कृति हमारे संस्कार जो हमारी धरोहर है, उसका संवर्धन करना चाहिए। आचार्य गणों ने कहा कि
श्रावण पूर्णिमा पर रक्षासूत्र बांधने, व्रत करना, नदी स्नान , दान ,ऋषि पूजन, तर्पण और तप करने का महत्व रहता है।श्रावण सबसे सिद्धिदायक मास होता है इसीलिए कठिन उपवास करते हुए जप, ध्यान या तप किया जाता है। श्रावण माह में श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को श्रावणी उपाकर्म प्रत्येक हिन्दू के लिए जरूरी बताया गया है। इसमें दसविध स्नान करने से आत्मशुद्धि होती है व पितरों के तर्पण से उन्हें भी तृप्ति होती है। श्रावणी पर्व वैदिक काल से शरीर, मन और इन्द्रियों की पवित्रता का पुण्य पर्व माना जाता है। प्राचीनकाल में ऋषि-मुनी इसी दिन से वेदों का पाठ करना शुरू करते थे। श्रावणी उपाकर्म में यज्ञोपवीत पूजन और उपनयन संस्कार करने का विधान है। अर्थात श्रावणी पर्व पर द्विजत्व के संकल्प का नवीनीकरण किया जाता है। उसके लिए परंपरागत ढंग से तीर्थ आवाहन, दशविध स्नान, हेमाद्रि संकल्प एवं तर्पण आदि कर्म किए जाते हैं। चंद्रदोष से मुक्ति के लिए श्रावण पूर्णिमा श्रेष्ठ मानी गई है। इस दिन पेड़-पौधे लगाने का भी खास महत्व होता है। वृक्षारोपण करने पर अनंत गुणा पुण्य लाभ होता है। श्रावणी उपाकर्म में पाप-निवारण हेतु पातकों, उपपातकों और महापातकों से बचने, परद्रव्य अपहरण न करने, परनिंदा न करने, आहार-विहार का ध्यान रखने, हिंसा न करने, इंद्रियों का संयम करने एवं सदाचरण करने की प्रतिज्ञा ली जाती है। श्रावणी उपाकर्म के 3 पक्ष हैं- प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। इस अवसर पर हेमाद्रि संकल्प लेकर समस्त विप्र यजमान अपनी इच्छाशक्ति को प्रगाढ़ता प्रदान करते है ।

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