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Friday, 31 March 2023

जल जंगल जमीन ही है जीने का आधार--मेघा पाटकर जन आंदोलनों के राष्ट्रीय सम्मेलन में होगी सोच विकास की अवधारणा पर


 
जल जंगल जमीन ही है जीने का आधार--मेघा पाटकर

जन आंदोलनों के राष्ट्रीय सम्मेलन में होगी सोच विकास की अवधारणा पर

नर्मदापुरम। नदियों को बचाने की कोई ठोस योजना नहीं होने के कारण देश भर की नदियों के अस्तित्व पर खतरा बरकरार है। अनेकों जगह पर बड़े बडे डेम बनाए जा रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ नदियों का और पहाड़ों का लगातार सीना छलनी किया जा रहा है। इसी कारण ऋतु चक्र बिगड़ रहा है। अगर समय रहते सरकार ने इस और ध्यान नहीं दिया तो इस बात का खामियाजा आगामी दिनों में आमजन को भुगतान पड़ सकता है। नदियों को बचाने के लिए आम जन को आगे आना होगा अन्यथा सरकारें सब कुछ ध्वस्त करने के बाद भी नहीं चेतेंगी। उक्त बात शुक्रवार को पत्रकार वार्ता के दौरान नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेघा पाटकर ने कही। 
उन्होंने कहा कि एनबीए एक भारतीय सामाजिक आंदोलन है देश में पिछले कई सालों से विकास की अवधारणा नियोजन दिशा और अवसरों पर जनता जन प्रतिनिधि तथा शासक प्रशासकों के बीच बहस जारी है। विकास योजनाओं के सामाजिक  पर्यावरणीय जल जंगल जमीन पर होने वाले असर और आघात विस्थापन बिना आदि को लेकर कई जगह पर संघर्ष जारी है इसमें शामिल है गंगा ब्रह्मपुत्र कावेरी महानदी गोदावरी के साथ-साथ नर्मदा घाटी भी दक्षिण से उत्तर पूर्व भारत तक के किसान मजदूर आदिवासी मछुआरे सभी के विकास पर सवाल सुझाव विकल्प की सोच को लेकर11 राज्यों के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता 1 और 2 अप्रैल को नर्मदा तवा नदी के संगम स्थल बांद्राभान में एकत्रित हो रहे हैं जिसमें किसान मजदूरों मछुआरे के साथ नर्मदा नदी सहित देशभर की विभिन्न नदियों के मुद्दे पर विचार किया जायेगा। वही 2 अप्रैल शाम 4:00 बजे कलेक्ट्रेट कार्यालय के पास पीपल चौक पर विशाल आमसभा की जाएगी । इस आंदोलन का लक्ष्य भारत में जन आंदोलनों में एकता और ताकत को बढ़ावा देना है और न्याय के विकास के लिए काम करने के लिए सरकारी दमन से लडऩा और चुनौती देना है नर्मदा बचाओ आंदोलन के माध्यम से विस्थापितों के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं ।मेघा पाटकर ने कहा कि  देश और दुनिया में कोरोनाग्रस्त जीवन भुगतते हुए जाना है ।
प्रकृति का महत्व जीवन का आधार रही है प्रकृति और प्राकृतिक व्यवस्था की एक एक इकाई नदी घाटी पहाड़ समंदर किनारा या मैदानी खेती क्षेत्र वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों से ही जीवित रहती है  सरकार पर आरोप लगाए कि जिस तरह से बजट पेश हुआ है वह किसानों के साथ ही स्वास्थ्य एवं शिक्षा के लिए सही नहीं है। 
 मेधा पाटकर ने कहा कि बजट में 2022 में जितनी राशि किसानों के लिए आवंटित की गयी थी, उससे भी कम राशि इस बजट में दी गयी है। वहीं, किसानों के लिए अलग-अलग निधि जैसे पीएम कल्याण निधि में भी बजट का आवंटन कम किया गया है, जिससे किसानों को अपनी उपज का सही दाम नहीं मिलेगा जबकि मंडियों की बढ़ोतरी होनी चाहिए थी, जिससे मंडियों में किसानों का माल अधिक बिकता। लेकिन सरकार तीन कानूनों पर अमल करते हुए आज भी निजी हाथों में ही किसानों की उपज का माल सौंपना चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया की अडानी जैसे लोगों को इससे फायदा होगा, उनके गोदामों में माल अधिक भर जायेगा जबकि ऑडीटर जनरल की रिपोर्ट है कि उनको अधिक भाड़ा दे दिया गया है। लेकिन सरकार यही चाहती है कि वे ही लोग किसानों का माल खरीदें। इस अवसर पर विभिन्न प्रांतों से आए हुए सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे।
ब्यूरो रिपोर्ट मनोज सोनी

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