मनोज सोनी एडिटर इन चीफ
सामाजिक समरसता एवं एकात्मता एक मजबूत राष्ट्र की नींव- श्रीमती सुनंदा रघुवंशी
नर्मदापुरम। संघ शताब्दी वर्ष में निमित्त देश भर में सदभावना बैठकों दौर जिला एवं नगर, खंड जारी स्तर पर जारी है। इसी क्रम में नर्मदापुरम नगर में सद्भाव कार्य विभाग के आग्रह पर सदभावना बैठक का आयोजन नगर के मैरिज गार्डन में किया गया, इस बैठक में अनेक समाजों से समाज कल्याण के लिए कार्य कर रही समितियों, क्लबों, संस्थाओं के प्रमुख जन उपस्थित थे। कार्यक्रम में पधारे समाज जनों के विस्तृत परिचय के साथ बैठक की शुरुआत हुई, आगन्तुकों का परिचय गटनायकों ने कराया।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में गौर, चौरे, परदेसी, कुर्मी,कलार, नामदेव, कीर सोनी, खंडेलवाल, केवट, माझी,कहार, सनाढ्य, कानकुंज, जिझोतिया, बुंदेलखंडी राही,गोस्वामी, राय, किरार, कलचुरी साहू, श्रीवास्तव, अग्रवाल, गुप्ता, जैन, दिगंबर, श्वेतांबर, पीताम्बर ,कायस्थ, यदुवंशी, सेन, लोधी, मीणा, प्रजापति, परिहार, राजपूत, कुचबँदिया, वाल्मीकि, वंशकार, काड़ा,मानिकपुर ,ब्राह्मण, पंजाबी, सिंधी, बंगाली, चौरसिया,रजक,मराठा,सैनी,माली,गुर्जर,रघुवंशी,सिक्ख,लोहार, सीकलीकर बढ़ई, वनवासी,काछी, अहीरवार, मेहरा,समाज,,गढवाल,क्षत्रीय समाजों के प्रमुख उपस्थित थे। के महिला पुरुष उपस्थित थे। 60 समाजों का प्रतिनिधित्व हुआ। मंच पर प्रान्त महिला समन्वयक एवं सह संयोजिका पर्यावरण संरक्षण की प्रांतीय अधिकारी श्रीमति सुनंदा रघुवंशी एवं जिला महिला श्रीमती दुर्गा भदौरिया
मुख्य वक्ता श्रीमती सुनंदा रघुवंशी ने समाज जनों को सम्बोधन करते हुए कहा कि सामाजिक सद्भाव का अर्थ है विभिन्न समाजों एवं जातियों के बीच आपसी सामंजस्य, सम्मान एवं सहयोग की भावना का निर्माण। वर्तमान समय में समाजों के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष भले ही कम हो, किन्तु एकता का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। अतः प्रथम चरण में सभी उपजातियाँ अपने अहंकार को त्यागकर एक जाति के रूप में संगठित हों तथा द्वितीय चरण में सभी जातियाँ “हिंदू” के नाते एकजुट हों यही सच्चा सामाजिक सद्भाव है।
एक-दूसरे की परंपराओं, मान्यताओं, महापुरुषों एवं संतों का सम्मान करना ही सामाजिक समरसता का आधार है। इसी उद्देश्य से वर्ष 2006 में गुरुजी जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर सामाजिक सद्भाव कार्य का प्रारंभ किया गया।
सामाजिक सद्भाव कार्य के प्रमुख आयाम: सामाजिक नेतृत्व: विभिन्न समाजों के निर्वाचित प्रतिनिधियों, युवा एवं मातृशक्ति तथा प्रभावी व्यक्तित्वों को जोड़ना।धार्मिक नेतृत्व: धर्माचार्य, महंत, पुजारी, मठ प्रमुख, प्रवचनकार एवं मंदिर ट्रस्टियों को एक मंच पर लाना।आध्यात्मिक नेतृत्व: विभिन्न आध्यात्मिक संगठनों के सहयोग से युवाओं को राष्ट्रहित के कार्यों से जोड़ना। एकात्म हिंदू समाज का निर्माण सैकड़ों वर्षों के संघर्ष के कारण समाज में विभाजन उत्पन्न हुआ। “हम सब एक ही परमात्मा की संतान हैं” इस भाव को पुनः जागृत कर भेदभाव रहित समाज का निर्माण करना आवश्यक है देशभक्त हिंदू समाज का निर्माण देशभक्ति की भावना के क्षीण होने से समाज को हानि उठानी पड़ी। अतः प्रत्येक व्यक्ति में राष्ट्रभक्ति का जागरण आवश्यक है, जिससे समाज सशक्त एवं संगठित बन सके।
समाज प्रमुखों हेतु संवाद बिंदु:
निर्दोष समाज निर्माण अहंकार एवं स्वार्थ जैसी बुराइयों का त्याग, संस्कारवान समाज निर्माण परिवार एवं मंदिर आधारित संस्कारों का संवर्धन, संगठित समाज निर्माण सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों में समन्वय, जागृत समाज निर्माण समाज विरोधी शक्तियों के प्रति सजगता सक्रिय समाज निर्माण समाज परिवर्तन में सक्रिय सहभागिता।
उपस्थित जनों ने एक स्वर में कहा कि समाज के सभी वर्ग सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक नेतृत्व एक साथ मिलकर कार्य करेंगे जिससे व्यापक सामाजिक परिवर्तन संभव होगा। सभी उपस्थितजनों से आग्रह किया गया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में सद्भाव, एकता एवं राष्ट्रभक्ति के भाव को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य करें।
अंत में सामूहिक वन्देमातरम गीत के साथ कार्यक्रम के समापन पश्चात जलपान कर उपस्थित जनों ने प्रस्थान किया।


No comments:
Post a Comment