अमरकंटक समस्त पापों का नाश करने वाला मां रेवा का सबसे पुण्यदायी क्षेत्र है पंडित योगेंद्र दिव़ोलिया
नर्मदा पुरम । मोरछली चौक स्थित श्री गणेश, मा नर्मदा, साईं, राधा कृष्ण मंदिर पर नर्मदा जयंती महोत्सव पर आयोजित नर्मदा पुराण कथा का वाचन करते हुए चतुर्थ दिवस पर पंडित जी ने कहा की मां नर्मदा अमरकंटक से प्रकट हुई है वहां पर नर्मदा का सर्वोत्तम तट है और भगवान आशुतोष समस्त परिवार के साथ यहां निवास करते है । मार्कडण्ये मुनि ने यहां पर आकर तप किया और भगवान शिव को प्रसन्न कर सात घोर प्रलय में भी जीवित रहने का वरदान पाया। नर्मदा देवी विंध्याचल पर्वत की मेकाल पर्वत श्रेणी से प्रकट हुई है इसलिए मां नर्मदा का एक नाम मेकलसुता भी है।
मां नर्मदा का ओंकारेश्वर तीर्थ , भृगु क्षेत्र भडौच और नर्मदा कावेरी संगम में अत्यंत ही दुर्लभ है।
नगर के मोरछली चौक स्थित श्री गणेश नर्मदा साईं राधा कृष्ण शंकर मंदिर और नर्मदा जयंती के पर्व पर आयोजित सप्त दिवसीय श्री नर्मदा पुराण कथा के दौरान कथा व्यास पीठ से पं योगेंद्र दिवोलिया ने नर्मदा के पंद्रह नामों का वर्णन करते हुए बताया की मां नर्मदा के दर्शन मात्र से ही समस्त पापों का नाश कर देती है। जिस तरह गंगा जी हरिद्वार , प्रयाग और गंगा सागर में विशेष पुण्यमयी है वैसे मां नर्मदा का ओंकारेश्वर तीर्थ , भृगु क्षेत्र भडौच और नर्मदा कावेरी संगम में अत्यंत ही दुर्लभ और विशेष फल देने वाली है। और समस्त पापों को नाश करने वाली है।
नर्मदा समस्त पाप तापों का दर्शन मात्र से ही नष्ट कर देती है
नर्मदा जयंती पर्व पर आयोजित सप्त दिवसीय नर्मदा पुराण कथा व्यास पीठ से पं योगेंद्र दिवोलिया के नर्मदा के पंद्रह नामों का वर्णन करते हुए बताए की मां नर्मदा दर्शन मात्र से ही समस्त पापों का नाश करती है। गंगा एक स्नान से , यमुना तीन स्नान से और सरस्वती सात बार स्नान से जो फल देती है वो मां नर्मदा एक बार सच्चे मन से दर्शन करने से ही दे देती हैं ।
संतो का संग मनुष्य जीवन को सुधार देता है और उन्हें सत्कर्म पर चलना सिखाता है, जिससे उन्हें मोक्ष की सहज ही प्रति हो जाती है। सप्त दिवसीय नर्मदा पुराण के ती दिन व्यास पीठ से कथा सुनाते हुए व्यास आचार्य ने कहा की नर्मदा का तट तो शिव और साधुओं का ही तट है। नर्मदा के अमरकंटक क्षेत्र में नर्मदा और कपिला के संगम पर मां नर्मदा के पुत्र घीष्णेन्द्र के युद्ध के शल्य अर्थात् घाव ठीक हो गए थे इसलिए यह संगम विशल्या नाम से प्रसिद्ध हुआ।


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