मनोज सोनी एडिटर इन चीफ
प्रकृति के रंगों से महकेगी होली, पलाश के पुष्पों से होगा मां भगवती का अर्चन और सात्विक रंगोत्सव
केमिकल मुक्त रंगों की ओर लौट रही है परंपरा
नर्मदापुरम। होली का त्योहार केवल हुड़दंग का नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तादात्म्य बैठाने का पर्व है। इस वर्ष के रंगोत्सव में पलाश (टेसू) के फूलों का महत्व एक बार फिर चर्चा में है। ज्योतिषाचार्य पं. हरिओम मिश्रा के अनुसार, पलाश के फूलों से होली खेलना न केवल सांस्कृतिक रूप से शुभ है, बल्कि यह आध्यात्मिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सर्वोत्तम है।
पलाश को 'वन की ज्वाला' कहा जाता है। पं. मिश्रा का कहना है कि माँ भगवती के अर्चन में इन पुष्पों का प्रयोग विशेष फलदायी होता है। मान्यता है कि पलाश के केसरिया पुष्पों से शक्ति की उपासना करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सात्विकता का संचार होता है। विशेषकर रंग पंचमी के अवसर पर इनका उपयोग देव-पूजन और उत्सव के लिए अत्यंत मंगलकारी माना गया है।
आज के दौर में जहाँ बाजारू केमिकल युक्त रंग त्वचा और आंखों को नुकसान पहुँचा रहे हैं, वहीं पलाश के फूलों से तैयार प्राकृतिक रंग एक सुरक्षित विकल्प बनकर उभरे हैं। इसके फूलों का अर्क शरीर को गर्मी से राहत देता है। आयुर्वेद के अनुसार, पलाश के पानी से स्नान करने से चर्म रोगों में लाभ मिलता है। हमारी परंपराएं विज्ञान पर आधारित हैं। पलाश के फूलों से होली खेलना प्रकृति का सम्मान करना है।

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